बलवीर सिंह 30 सालों से एटलस साइकिल की फैक्ट्री में काम करते हैं. उनका साइकिल के सामने के हिस्से पर गत्ता चढ़ाने का काम है. जाने कितनी ही साइकिल उनके हाथों से बनकर निकली होंगी लेकिन अब वो ये काम नहीं कर पाएंगे क्योंकि एटलस साइकिल की उत्तर प्रदेश में साहिबाबाद स्थित फैक्ट्री में काम रोक दिया गया है.

अपने हालात के बारे में बताते हुए बलवीर सिंह फफक कर रो पड़ते हैं. वह कहते हैं, “मैं 30 सालों से इस फैक्ट्री में काम कर रहा हूं. ये तो हमारा परिवार थी लेकिन अचानक से काम रोक दिया. मेरे तीन बच्चे हैं. बेटी का तीन बार ऑपरेशन हो चुका है. मैं घर में अकेला कमाने वाला हूं. मैं बच्चों की पढ़ाई और शादी का ख़र्चा कहां से लाऊंगा.”

आख़िरी यूनिट में भी काम बंद

साहिबाबाद में एटलस कंपनी की आख़िरी यूनिट थी जिसमें आर्थिक संकट के चलते काम बंद कर दिया गया है.

इसके साथ ही एटलस साइकिल का उत्पादन भी पूरी तरह रुक गया है.

साथ ही रुक गई है यहां काम करने वाले करीब 1000 कर्मचारियों की ज़िंदगी. तीन जून का दिन जैसे उन्हें बेसहारा कर गया.

बलवीर सिंह बताते हैं, “हम बहुत खुश थे कि लॉकडाउन के बाद एक जून को फैक्ट्री में काम शुरु हो रहा था. दो दिन हम काम पर भी गए. लेकिन, तीन जून को जब पहुंचे तो देखा कि कंपनी के बाहर काम बंद होने का नोटिस लगा है. हमारे तो जैसे होश ही उड़ गए. हमें अंदाज़ा भी नहीं था कि ऐसा होने वाला है. कंपनी ने लिखा था कि उसके पास पैसा नहीं है इसलिए अभी फैक्ट्री को नहीं चलाया जा सकता. हम सबको मायूस होकर घर लौटना पड़ा.”

क्या लिखा है नोटिस में

फैक्ट्री के बाहर दो जून की तारीख में एक नोटिस लगाया गया है. नोटिस में लिखा है, “जैसा कि सभी कर्मकारों को भली-भांति ज्ञात है कि कंपनी पिछले कई वर्षों से भारी आर्थिक संकट से गुज़र रही है. कंपनी ने सभी उपलब्ध फंड खर्च कर दिए हैं और स्थिति ये है कि कोई अन्य आय के स्रोत नहीं बचे हैं.”

“सेवायोजक जब तक धन का प्रबंध नहीं कर लेते तब तक वे कच्चा माल खरीदने के लिए भी असमर्थ हैं. ऐसी में सेवायोजक फैक्ट्री चलाने की स्थिति में नहीं हैं. यह स्थिति तब तक बने रहने की संभावना है, जब तक सेवायोजक धन का प्रबंध ना कर लें. अत: सभी कर्मकार 03.06.20 से बैठकी (ले-ऑफ) पर घोषित किये जाते हैं. ले-ऑफ की अवधि में कर्मकारों को फैक्ट्री के गेट पर नियमानुसार अपनी हाजिरी लगानी होगी.”

लेकिन, फैक्ट्री में काम कर रहे कामगारों के लिए ये नोटिस देखना किसी बुरे सपने से कम नहीं है. यहां सालों-साल से काम करते हुए उनकी उम्र 50-55 साल हो चुकी है. नया काम ढूंढ़ना भी उनके लिए चुनौती बन गया है.

यहां 30 सालों से काम कर रहे पीएन पांडे कहते हैं, “अब इस उम्र में हमें नई नौकरी खोजनी होगी. आज काम रोका है, कल फैक्ट्री ही बंद कर देंगे. हम कहां जाएंगे. 200-300 रूपये से यहां काम शुरू किया था. आज 10-12 हज़ार कमाते हैं. यहां दिन-रात काम किया था. छुट्टी के दिन बुलाया, तो भी गए. कभी कोताही नहीं की लेकिन आज अचानक सब ख़त्म कर दिया.”

पीएन पांडे माल चैकिंग का काम करते थे. वह अपनी पत्नी और दो बच्चों के साथ ग़ाज़ियाबाद में किराए के मकान में रहते हैं. वह कहते हैं कि मकान मालिक तो किराया मांगेगा ही, बच्चों की पढ़ाई का ख़र्च भी है. इस उम्र में कहां जाएं नौकरी मांगने.

कामगारों की आपत्तियां

अचानक से कर्मचारियों को ले-ऑफ़ पर भेजने से कंपनी और कामगारों के बीच विवाद शुरु हो गया है. कामगारों का कहना है कि कंपनी को कामबंदी से पहले पूरी सूचना देनी चाहिए. साथ ही ले-ऑफ़ में डालने से उनका भविष्य अधर में लटक गया है.

साइकिल कर्मचारी यूनियन के महासचिव महेंद्र कुमार कहते हैं, “कंपनी को पहले हमें इस बारे में जानकारी देनी चाहिए थी. हम नौकरी पर हैं या नहीं हमें तो ये भी नहीं पता. इसलिए हमने श्रम आयुक्त और श्रम मंत्री को चिट्ठी लिखकर इसकी शिकायत की थी.”

“हमारा कहना है कि 1000 कामगारों का रोजगार बचाया जाया. मालिक को भी पत्र भेजा था लेकिन उन्होंने रिसीव नहीं किया. इसलिए हमने ऑफ़िस के बाहर ही पत्र चिपका दिया. पहले कुछ महीनों पहले ठेकेदारी वाले कामगारों को निकाल दिया गया और अब हमें ले-ऑफ़ में डाल दिया. हमारी मांग है कि ले-ऑफ़ के दौरान पूरी तनख़्वाह दी जाए. अगर उन्हें फैक्ट्री नहीं चलानी है तो हमारा पूरा हिसाब-किताब करके बकाया दिया जाए. लेकिन, ऐसे बीच मझधार में हमें फंसाकर ना रखें.”

लॉकडाउन के दौरान कंपनी ने मार्च और अप्रैल की तनख़्वाह दी है लेकिन अभी कामगारों का कहना है कि मई की तनख़्वाह नहीं मिली है.

कर्मचारी यूनियन की शिकायत के बाद पांच जून को उप श्रम आयुक्त गाजियाबाद के कार्यालय में यूनियन और कंपनी के प्रतिनिधियों को बुलाकर बैठक की गई थी. इस बैठक में कंपनी ने बताया कि वो फैक्ट्री फिर से शुरू करने की इच्छुक है.

इस बैठक के नतीजों को लेकर ग़ाज़ियाबाद उप श्रम आयुक्त राजेश मिश्रा ने बताया, “कंपनी का कहना है कि फैक्ट्री अभी बंद नहीं हुई है. फ़िलहाल उत्पादन नहीं किया जाएगा लेकिन जब तक बैठगी चलेगी तब तक कामगारों को 50 प्रतिशत वेतन देंगे. उन्होंने कहा है कि कंपनी प्रयास में है कि कहीं और से अगर फंड मिल जाए तो ये फैक्ट्री शुरु करेंगे. हम मज़दूरों के अधिकारों का पूरा ध्यान रखेंगे.”

क्या कहती है कंपनी

इस पूरे मामले को लेकर एटलस कंपनी के सीईओ एनपी सिंह राणा ने बीबीसी से कंपनी के पक्ष पर बात की. उन्होंने कहा, “कंपनी फैक्ट्री बंद नहीं करना चाहती है. लेकिन, आर्थिक नुक़सान के कारण फ़िलहाल काम शुरू नहीं कर सकती. इसलिए वो पहले फंड इकट्ठा करना चाहती है. ये फंड सोनीपत की एक संपत्ति को बेचकर जुटाया जाएगा, जिसका इस्तेमाल साहिबाबाद में उत्पादन के लिए होगा.”

एनपी सिंह ने कहा, “सोनीपत की संपत्ति बेचने के लिए हमने नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल में अनुमति के लिए आवेदन किया हुआ है. इसकी सुनवाई 18 जून को होनी है. इसके बाद जो भी फ़ैसला होगा वो कर्मचारियों को बताया जाएगा. उनके साथ 23 जून को एक बैठक रखी गई है. लेकिन, हम आश्वस्त करते हैं कि कंपनी फैक्ट्री बंद नहीं करना चाहती. साथ ही ले-ऑफ़ की अवधि के दौरान कंपनी के 432 कामगारों को आधा वेतन दिया जाएगा. हमारा उनसे कोई विवाद नहीं है.”

हालांकि, महेश कुमार इस बात से आश्वस्त नहीं हैं. वह कहते हैं कि ‘अगर कंपनी को ज़मीन बेचनी ही थी तो पहले क्यों नहीं बेच दी गई. फैक्ट्री बंद होने का इंतज़ार क्यों किया. जो ज़मीन अब तक नहीं बेची, उसे आगे क्या बेचेंगे. फिर उस ज़मीन पर पारिवारिक विवाद भी चल रहा है. ये बस अभी विवाद को ठंडा करने की कोशिश है.’

महेश कुमार आधी तनख़्वाह को भी कामगारों के लिए नाकाफ़ी बताते हैं. उनका कहना है, “जिसे 10-12 हज़ार तनख़्वाह मिलती थी, वो अभी आधे पैसों में घर कैसे चलाएगा. किराया और ख़र्चा तो उतना ही है लेकिन तनख़्वाह आधी हो गई है. कंपनी जो भी फ़ैसला लेगी लेकिन कामगार तो भूखे ही मरेंगे. इसलिए हम पूरी तनख़्वाह दिए जाने की मांग करते हैं.”

इस हाल में कैसे पहुंची एटलस

1951 में शुरू हुई एटलस एक समय पर साइकिल का पर्याय बन गई थी. लोगों के बचपन की ढेरों यादें इससे जुड़ी हैं. लेकिन, साइकिल की दुनिया का ये बड़ा नाम धीरे-धीरे धूमिल पड़ने लगा.

कंपनी की वेबसाइट पर दी गई जानकारी के मुताबिक उसकी हर साल 40 लाख साइकिल के उत्पादन की क्षमता है. साथ ही भारत ही नहीं पूरे विश्व में कंपनी के उत्पाद बेचे जाते हैं.

लेकिन, पिछले कई सालों से लगातार भारत में कंपनी की फैक्ट्रियां बंद हो रही हैं. साल 2014 में मध्य प्रदेश में मालनपुर की फैक्ट्री बंद हुई थी. उसके बाद 2017 में हरियाणा के सोनिपत में स्थित फैक्ट्री बंद हुई. कंपनी को उन फैक्ट्रियों से नुक़सान हो रहा था.

साथ ही कंपनी का नाम भी एटलस साइकिल इंडस्ट्रीज़ (एसीआईएल) से बदलकर एटलस साइकिल (हरियाणा) लिमिटेड हो गया.

अब कंपनी का कहना है कि उसे साहिबाबाद की फैक्ट्री में भी नुक़सान होने लगा है.

सीईओ एनपी सिंह राणा ने बताया, “नुक़सान की शुरुआत नवंबर 2019 से होने लगी थी. पहले जहां उत्पादन एक से डेढ़ लाख साइकिल हुआ करता था वो अब 15 से 20 हज़ार साइकिल तक पहुंच गया. हम लंबे समय से घाटे में जा रहे थे. इस वक़्त कंपनी पर सवा सौ करोड़ की देनदारी भी है जिसे हम चुकाना चाहते हैं. हालांकि, हम पर बैंक का कोई भी कर्ज़ बकाया नहीं है.”

बाज़ार पर कभी एकछत्र राज करने वाली 70 साल पुरानी कंपनी के ढलान पर जाने की क्या वजह है. इस पर एनपी सिंह कहते हैं, “किसी भी कारोबार में ऐसा समय आ सकता है. पहले आप आगे बढ़ते जाते हैं और बढ़े स्तर पर विस्तार करते हैं. आपके पास हर तरह का संसाधन होता है. लेकिन, इसके बाद जब ढलान शुरू होती है तो स्थितियां संभालना थोड़ा मुश्किल हो जाता है.”

“हमारे साथ स्थितियां कुछ ऐसी होती चली गईं कि पहले एक इकाई से परेशानी शुरू हुई जो दूसरी जगह भी बढ़ती गई. हम हर तरह से बचाने की कोशिश कर रहे हैं. हमारे पास एक विकल्प बचा है जिसके ज़रिए हम फंड की कमी को दूर करना चाहते हैं.”

ले-ऑफ़ में फंस गए कामगार

हालांकि, इस मामले पर स्वतंत्र श्रम शोधकर्ता और एक्टिविस्ट राखी सहगल कुछ महत्वूपर्ण सवाल उठाती हैं.

उनका कहना है कि ले-ऑफ में कामगारों का भविष्य अधर में लटक गया है. अगर कंपनी चल रही होती तो मैं फंड जुटाने की बात पर भरोसा करती. लेकिन, काम बंद करके अचानक ले-ऑफ करना फैक्ट्री बंद करने का संकेत देता है. वहीं, संपत्ति बेचने की इजाज़त मिल भी गई तो ले-ऑफ़ तब तक बना रहेगा जब तक संपत्ति बेचकर वो उत्पादन शुरू नहीं करती. संपत्ति कब तक बिकेगी कोई नहीं जानता. ऐसे में कामगारों के लिए बड़ी मुश्किल स्थिति है.

साथ ही राखी सहगल कहती हैं कि प्रबंधन को ले-ऑफ से पहले कर्मचारियों को सूचना देनी चाहिए थी. इस संबंध में श्रम आयुक्त को भी पूर्व सूचना दी जाती है.

अगर कामगारों की कामकाजी स्थिति में बदलाव होता है तो श्रम क़ानून की धारा 9ए के तहत उन्हें जानकारी दी जाती है. साथ ही कर्मचारियों को हाज़िरी लगाने के लिए बाध्य करके उन्हें कहीं और काम करने से भी रोक दिया गया है. इस पूरे मामले पर श्रम विभाग को विशेष तौर पर नज़र रखनी होगी ताकि कामगारों के अधिकारों का हनन ना हो.

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