क्या लगता है आपको, साल 2020 इतिहास में किन वजहों से याद रखा जाएगा ? एक वजह यदि कोरोना महामारी को माना जाए, तो दूसरी शर्तिया वजह क्या हो सकती है?

साल 2020 के पहले छह-सात महीनों पर नज़र डालें तो, हिमालय में 4000 मीटर की ऊंचाई पर भारत और चीन के सैनिकों के बीच हुई हिंसक झड़प, निश्चित तौर पर वो घटना है, जो इतिहास में दर्ज हो गई है.

दोनों देशों में रज़ामंदी थी कि सीमा पर गोली नहीं चलेगी. लेकिन विषम भौगोलिक परिस्थितियों में हुई ज़बर्दस्त हाथापाई सैनिकों की मौत की वजह बनी.

इसके बाद दोनों देशों के बीच वो तनाव देखने को मिला, जो बीते कई दशकों में कभी नज़र नहीं आया था.

परमाणु हथियारों से लैस भारत और चीन सिर्फ पड़ोसी ही नहीं, बल्कि दुनिया के दो सबसे ज़्यादा आबादी वाले देश भी हैं.

दोनों ही इस शताब्दी के आख़िर तक, दुनिया की दो सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने के दावेदार हैं.

लेकिन इस साल जून में गलवान घाटी में हुई हिंसक झड़प ने कई सवालों को जन्म दिया है. इसमें ये सवाल भी शामिल है कि भारत बनाम चीन, क्या 21वीं सदी का सबसे बड़ा झगड़ा, सबसे बड़ी ‘राइवलरी’ साबित हो सकती है.

इस सवाल का जबाव जानने के लिए हमने कुछ विशेषज्ञों से बात की.

दो परमाणु ताकतों के बीच झड़प

हमारे पहले विशेषज्ञ हैं क्रिस डोहटी, जो सेंटर फ़ॉर न्यू अमेरिकन सिक्योरिटीज़ के डिफेंस प्रोग्राम में सीनियर फेलो हैं, वो कहते हैं, “सीमा पर जब ऐसी झड़पें होती हैं तो दिमाग के एक हिस्से में ये चिंता भी होती है कि इसकी वजह से संघर्ष भी हो सकता है, ख़ासतौर पर तब, जबकि दोनों देशों के पास परमाणु हथियार हैं.”

हिमालय के पर्वतों में भारत-चीन की सीमा 3 हज़ार किलोमीटर से भी ज़्यादा लंबी है. जून के महीने में जिस गलवान नदी घाटी में दोनों देशों के सैनिकों में झड़प हुई, उस इलाके पर भारत और चीन दोनों ही अपना दावा करते हैं.

क्रिस डोहटी का मानना है, ” यहां आप दुर्गम पहाड़ों और ऑक्सीज़न की कमी से जूझते हुए अपने वाहनों से भी लड़ते हैं क्योंकि उनके लिए भी चलना मुश्किल होता है. जिस रास्ते पर आप चलते हैं, वो भूस्खलन या हिमस्खलन में कभी भी तबाह हो सकता है. इन रास्तों पर आगे बढ़ना बेहद चुनौतीभरा होता है.”

जिस इलाके में जानलेवा झड़प हुई, उस इलाके में दोनों पक्ष पेट्रोलिंग बेहतर करने के लिए सड़कें बनाते रहे हैं. क्रिस डोहटी के मुताबिक, “तिब्बत और शिनज़ियांग जैसी जगहों पर बुनियादी ढांचा बेहतर करने के लिए चीन ने बीते एक दशक में बहुत ख़र्चा किया है, ताकि उसके सैनिकों की त्वरित आवाजाही हो सके. इसके जबाव में भारत ने अपनी तरफ़ भी ऐसा ही किया. सीमा के एक तरफ़ बेहतर बुनियादी ढांचा दूसरे पक्ष में असुरक्षा की भावना बढ़ा देता है.”

भारत का मानना है कि उसकी फ़ौज, चीन की पीपल्स लिबरेशन आर्मी को मुंहतोड़ जबाव दे सकती है. हालांकि चीन का सैन्य बजट, भारत के रक्षा बजट से तीन गुना ज्यादा है. ऐसे में कभी दोनों देशों के सैनिकों के बीच गलवान घाटी जैसी नौबत दोबारा आई तो किसका पलड़ा भारी हो सकता है?

इस सवाल पर क्रिस डोहटी कहते हैं, “तब हो सकता है कि चीन ज़मीन का कुछ हिस्सा हड़प ले और सामरिक रूप से महत्वपूर्ण कुछ ठिकानों पर कब्ज़ा भी कर ले. लेकिन ज़मीन के हर इंच के बदले चीन को इस लड़ाई में बड़ी कीमत चुकानी पड़ सकती है. हालांकि नुकसान भारत को भी होगा, सैनिक दोनों ओर से मारे जाएंगे, लेकिन इस लड़ाई में जीत किसी की नहीं

आर्थिक मोर्चे पर क्या होगा असर

हमारे दूसरे विशेषज्ञ हैं अनंत कृष्णन जो पेश से एक पत्रकार हैं और ‘इंडियाज़ चाइना चैलेंज’ किताब के लेखक हैं. इस किताब में अनंत कृष्णन ने बताया है कि चीन के आगे बढ़ने की वजह से, भारत पर आर्थिक रूप से क्या असर पड़ा है. होगी.”

अनंत कृष्णन बताते हैं, “साल 2000 की शुरुआत तक भारत और चीन के कारोबारी संबंध बहुत कम थे. लेकिन बीते 20 साल में कारोबार तेज़ी से बढ़ा. भारत को चीन में बना सामान पसंद आने लगा और चीन, भारत का सबसे बड़ा क़ारोबारी साझेदार बन गया. सालाना दोतरफ़ा व्यापार 94 अरब डॉलर तक पहुंच गया. इसमें से 75 अरब डॉलर का माल भारत ने चीन से ख़रीदा.”

यानी इस दौरान चीन भारत पर कम, जबकि भारत, चीन पर बहुत अधिक निर्भर रहा है. गलवान घाटी में ख़ूनी झड़प के बाद, भारत में चीन से आने वाले सामान के बहिष्कार के स्वर गूंजे लगे. भारत ने युवाओं के बीच लोकप्रिय टिकटॉक समेत 59 चाइनीज़ ऐप्स पर पांबदी लगा दी.

इस बारे में अनंत कृष्णन का मानना है, “चीन में बने माल और चीन के निवेश का पूरी तरह से बहिष्कार ना तो व्यावहारिक है और ना ही मुमकिन. भारत कई सेक्टर में चीन से आयात पर निर्भर है. चीन जिस दाम पर सामान बनाता है, वैसा करने वाले ज़्यादा देश नहीं हैं.”

फॉर्मास्यूटिकल इंडस्ट्री एक ऐसा ही सैक्टर है. जेनेरिक दवाएं बनाने में इस्तेमाल होने वाली सामग्री का बड़ा हिस्सा, भारत चीन से ही ख़रीदता है. इसी तरह चीन से आने वाले ऑटो पार्ट्स, लौह-इस्पात से बने उत्पाद और कीटनाशक भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए ज़रूरी हैं. भारत में चीन के निवेश को अनदेखा नहीं किया जा सकता.

अनंत कृष्णन के मुताबिक, “भारत में चीन एक बड़ा निवेशक बनकर उभरा है. भारत के स्टार्ट-अप्स में चीन ने लगभग 5-6 अरब डॉलर का निवेश किया है. भारत की बड़ी टेक-कंपनियों में भी चीन ने भारी निवेश किया है.” यही वजह है कि आर्थिक मोर्चे पर भी चीन से जंग, भारत के पक्ष में नहीं है.

अनंत कृष्णन कहते हैं, “मुझे लगता है कि भारत का जहां फ़ायदा होगा, सरकार चीन से आने वाले निवेश का स्वागत करेगी. मसलन चीन के निवेश से कोई फै़क्ट्री बनती है और उससे भारत के लोगों को रोज़गार मिलता है. लेकिन साथ ही जहां मामला संवेदनशील होगा, भारत सरकार उस निवेश की बहुत जांच-पड़ताल करेगी.”

भारत काफी पहले से ये कोशिश करता रहा है कि जो विदेशी कंपनियां चीन में निवेश कर रही हैं, उन्हें चीन के बजाए भारत रास आ जाए. लेकिन अनंत कृष्णन का मानना है कि भारत सरकार की ये रणनीति बहुत कामयाब नहीं रही है.

वे कहते हैं, “सरकार कई वर्षों से कोशिश कर रही है कि भारत को मैन्यूफैक्चरिंग के मामले में पॉवरहाउस बनाया जाए. नरेंद्र मोदी ने साल 2014 में पहली बार सत्ता में आने के बाद मेक इन इंडिया कैम्पैन शुरू भी किया था. लेकिन बीते छह वर्षों में चीन पर भारत की निर्भरता कम होने के बजाए बढ़ गई है.”

इसके बावजूद भारत के पास एक बड़ी ताकत है और वो ताकत है भारत का विशाल बाज़ार. यही वजह है चीन की हर कंपनी भारत का रुख़ करना चाहती है.

एशिया का भविष्य

हमारी तीसरी विशेषज्ञ हैं तन्वी मदान जो वॉशिंगटन डीसी में ब्रूकिंग्स इंस्टीट्यूट के फॉरेन पॉलिसी प्रोग्राम में सीनियर फेलो हैं. ‘फेटफुल ट्रांइगल: हाऊ चाइना शेप्ड यूएस-इंडिया रिलेशंस ड्यूरिंग द कोल्ड वॉर’ उनकी हालिया किताब है.

तन्वी मदान कहती हैं, “भारत और चीन के बीच टकराव की कई वजहें हैं और ये वजहें बढ़ती जा रही हैं. भारत-चीन संबंध इस बात का बेहतरीन उदाहरण है कि बढ़ते आर्थिक संबंधों से राजनीतिक तनाव कम नहीं होता.”

गलवान घाटी में सैनिकों की मौत का ज़िक्र करते हुए वो कहती हैं, “भारत-चीन संबंधों में ये एक टर्निंग प्वाइंट है. भविष्य में इसके गंभीर नतीजे हो सकते हैं. हो सकता है कि सारी दुनिया पर इसका असर नहीं पड़े, लेकिन एशिया की राजनीति और एशियाई देशों के संबंधों पर इसका असर ज़रूर पड़ेगा.”

गलवान घाटी में भारत के साथ तनाव के बाद ऐसा लगा कि चीन तनाव को कम करने की कोशिश कर रहा है. चीन को आख़िर साउथ-चाइना-सी, ताइवान और हांगकांग भी देखना है. हालिया सीमा संघर्ष और तनाव से पहले, चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग और भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कई बार गर्मजोशी से मेल-मुलाक़ात कर चुके हैं.

तन्वी मदान का मानना है कि दोनों नेताओं में कुछ समानता है, जिस पर ग़ौर करने की ज़रूरत है, “दोनों ने ख़ुद को एक मज़बूत व्यक्ति के तौर पर दिखाया है. एक ऐसा मज़बूत व्यक्ति जो अपने देश को एक नए दौर में ले जा सकता है. फिर वो चाहें चाइनीज़ ड्रीम हो या फिर भारत को दोबारा महान बनाने की बात हो.”

लेकिन चीन की कोशिश एशिया का बॉस बनने की रही है, जबकि भारत को लगता है कि उसे चीन जैसे किसी बॉस की ज़रूरत नहीं है. गलवान घाटी में हुए संघर्ष के बाद भारत का ध्यान अपने कूटनीतिक साझेदारों की ओर गया है.

तन्वी मदान कहती हैं, “मुझे लगता है कि 15 जून की घटना के बाद भारत के नीति निर्माताओं को ये बात और बेहतर तरीके से समझ में आ गई होगी कि उनकी नीति हमेशा मध्य-मार्गी नहीं हो सकती. ख़ासतौर पर तब, जब बात अमरीका और चीन की हो. उन्हें कभी अमरीका की ओर झुकना होगा, तो कभी रूस जैसे देशों की तरफ़ जाना होगा.”

रूस से भारत को हथियार मिलते हैं. लेकिन रूस के चीन से भी अच्छे संबंध हैं. इसलिए भारत-चीन के बीच हालिया तनाव के दौरान रूस थोड़ा असमंजस में पड़ गया. दूसरी तरफ़ पाकिस्तान का भारत के प्रति रवैया जगज़ाहिर है.

इन समीकरणों की पृष्ठभूमि में तन्वी मदान कहती हैं, “चीन अब पाकिस्तान के साथ अपना सहयोग और अधिक बढ़ाना चाहेगा. पाकिस्तान भी भारत का प्रतिद्वंद्वी है. मुझे संदेह है कि चीन, पाकिस्तान से आगे बढ़कर, भारत के चारों ओर – नेपाल, श्रीलंका, बांग्लादेश और मालदीव में अपनी मौजूदगी और प्रभाव बढ़ाने की कोशिश करेगा.”

तन्वी मदान का ये भी मानना है कि भारत भी इसके जबाव में, ऐसे कूटनीतिक साझेदार चाहेगा, जो ना केवल चीन को बैलेंस करने में उसकी मदद करें, बल्कि भारत की सैन्य और आर्थिक क्षमताओं को भी बढ़ाएं. ऐसे में भारत की नज़र अमरीका और यूरोपीय देशों के अलावा ऑस्ट्रेलिया, जापान, वियतनाम और इंडोनेशिया पर भी होगी.

वॉल्फ वॉरियर डिप्लोमैसी

हमारी आख़िरी विशेषज्ञ हैं यू जिइये, जो ब्रिटेन के थिंक टैंक चैटम हाउस में चीन मामलों पर रिसर्च फैलो हैं. बीते कुछ वर्षों में चीन के ‘तेवरों’ का ज़िक्र करते हुए वो कहती हैं, “वॉल्फ वॉरियर डिप्लोमैसी, एक नया जुमला है. ये जुमला एक फिल्म से आया है जिसका नाम है वॉल्फ वॉरियर. ये चीन में उन लोकप्रिय फिल्मों में से एक है जिसमें दिखाया गया है कि चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी देश को बचाने और विदेशियों को सबक सिखाने में सक्षम है.”

उनका मानना है कि चीन ने व्यापक परिदृश्य में अब जो कड़ा रुख़ अपनाया है, उसमें अन्य देशों के साथ समझौतों के लिए गुंजाइश बहुत कम है. यही वजह है कि चीन के राजदूत अपने मेज़बान देशों में बहस करते नज़र आए हैं.

हाल के महीनों में जब कोरोना वायरस, महामारी के रूप में सामने आया, चीन ने किसी अगुआ की तरह सामने आने की कोशिश की. यू जिइये कहती हैं, “चीन को लगा कि उन्होंने कोविड-19 पर काबू पा लिया है, इसलिए चीन के पास दुनियाभर में पीपीई किट भेजने और समाधान का अपना अनुभव शेयर करने की मौलिक वजह है. सुनने में ये सब बड़ा सकारात्मक लगता है.”

यू जिइये का मानना है कि कोरोना के मामले में भी चीन के स्वर में मिठास नहीं थी. भारत उन देशों में शामिल था जिन्होंने कोरोना महामारी पर चीन के नज़रिए की आलोचना की और दावा किया कि चीन इस संकट का फायदा उठाकर क्षेत्र में अपना प्रभाव बढ़ाने की कोशिश कर रहा है.

यू जिइये का ये भी मानना है कि पश्चिमी देशों के साथ चीन का बढ़ता अलगाव भारत के पक्ष में कारगर साबित हो सकता है.

वे कहती हैं, “मुझे लगता है कि सीमा पर हुई झड़प के बाद जो माहौल बना, भारत उसका फायदा उठाने में कामयाब हुआ. भारत में भीतर भी राष्ट्रवाद को उभार मिला. लेकिन, चूंकि दोनों देशों के बीच भौगौलिक और आर्थिक रूप से तानाबाना इस तरह बुना है कि भारत किस हद तक चीन को नकार सकता है, वो एक अलग समीकरण है.”

फिर भी जानकार ये मानते हैं कि अर्थव्यवस्था और आबादी के लगातार बढ़ते आकार की वजह से भारत और चीन के संबंधों का महत्व भविष्य में कम नहीं होगा. इन दो विशाल देशों के बीच किसी भी तरह की प्रतिस्पर्धा उनके मतभेदों को निश्चित तौर पर बढ़ाएगी, जिसका सीधा असर एशिया और बाकी दुनिया की राजनीति पर भी पड़ेगा.

फिलहाल तो इस बात की संभावना बहुत कम हैं कि निकट भविष्य में मोदी और शी जिनपिंग पहले की तरह झूला झूलते नज़र आएं.

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